Tuesday, 23 March 2021

शीतलहर (sheetlahar)by Shivam sandoo

 

                                                                     शीतलहर






वो नम सी ठंड कहा ,महसूस तुम करपाओगे |

 जब झरनों के किनारों पर अपने दिल का हाल बताओगे ||

रूह के हर बंधन को, आजाद तब करपाओगे |

जब तरुन्नुम सी बारिश को ,सीने से लगाओगे ||

 

तुम बिखरे होए दाने को समेट रहे हो |

रिमझिम सी बारिश में घुल जाओगे ||

गुनगुनी सी धुप में रूबरू हो जाओगे |

जब तुम महसूस करोगे मेरा शीतलहर ||

 

तुम थके हुए से लगते हो , आओ थोरा विश्राम कर लो |

पल दो पल की स्मिरती से ,शीतलहर ले जाओ तुम ||

मेरी इन साँझ में , चार चाँद लगाओ तुम |

मधुर चांदनी रातों में , एक मुसाफिर बनकर आओ तुम ||

 

मैं दूर नही हूँ , फिर भी लोग अनजान समझते है |

अपने मधुर एहसासो को मुझसे क्यों छुपाते है ||

मैं दूर नभ से आया हूँ ,एक प्यारी सी मुस्कान लेकर |

तुम अपने ही जज्बातों को ,मुझसे क्यों चुराते हो ||

 

देखो वो कोकिला तैयार है ,तुमसे दो टुक की बात करने |

उन सावन की आरुषि में , फिर से जरा आओ तुम ||

जब तुम चुप रहते हो ,ये पत्थर आवाज देने लगते है |

वो अपने ही मधुर एहसासो से ,मुझको खीचने लगते है ||

 

उठता हूँ गिरता हूँ ,लहरों के संग  चलने की कोशिश करता हूँ |

दूर उस गगन में ,शीतलहर का सन्देश देता हूँ ||

मुझको क्यों ऐसा लगता है ,एक दिन तुम आओगे |

तुम अपने ही हाथों से , मुझको मुधुशाला पिलाओ तुम ||

 

मेरे इस तारीफ में , इक इशारा बनकर आओ तुम |

जगमगाते उन रौशनी में ,परी बनकर आओ तुम ||

तुम्हारे ही स्मिरती से ,खुद को कवि समझता हूँ |

मैं अपने ही जज्बातों से , तुमको सावरिया समझता हूँ ||

 

आओ लेकर चलता हूँ ,तुमको |

उन समंदर के किनारों पर ||

सनसनाहट सी हवाओं में शीतलहर कर देती है

तुमको जब भी देखता हूँ ,नए किरण का द्वार खुलता |

उन अंधेरी रातों में भी खुद को संभाले रहता हूँ ||

                                        - शिवम् सन्दू ( Published Author )

         *******************

 

  Copyright ©All Rights Reserved 2021||#sheetlahar by shivam sandoo||

Humsafar : Ek Ajab Daastan By the rising estaar