शीतलहर
वो नम सी ठंड कहा ,महसूस तुम करपाओगे |
जब झरनों के किनारों पर अपने दिल का
हाल बताओगे ||
रूह के हर बंधन को, आजाद तब करपाओगे |
जब तरुन्नुम सी बारिश को ,सीने से लगाओगे ||
तुम बिखरे होए दाने को समेट रहे हो |
रिमझिम सी बारिश में घुल जाओगे ||
गुनगुनी सी धुप में रूबरू हो जाओगे |जब तुम महसूस करोगे मेरा शीतलहर ||
तुम थके हुए से लगते हो , आओ थोरा विश्राम कर लो |
पल दो पल की स्मिरती से ,शीतलहर ले जाओ तुम ||
मेरी इन साँझ में , चार चाँद लगाओ तुम |
मधुर चांदनी रातों में , एक मुसाफिर बनकर आओ तुम ||
मैं दूर नही हूँ , फिर भी लोग अनजान समझते है |
अपने मधुर एहसासो को मुझसे क्यों छुपाते है ||
मैं दूर नभ से आया हूँ ,एक प्यारी सी मुस्कान लेकर |
तुम अपने ही जज्बातों को ,मुझसे क्यों चुराते हो ||
देखो वो कोकिला तैयार है ,तुमसे दो टुक की बात करने |
उन सावन की आरुषि में , फिर से जरा आओ तुम ||
जब तुम चुप रहते हो ,ये पत्थर आवाज देने लगते है |
वो अपने ही मधुर एहसासो से ,मुझको खीचने लगते है ||
उठता हूँ गिरता हूँ ,लहरों के संग
चलने की कोशिश करता हूँ |
दूर उस गगन में ,शीतलहर का सन्देश देता हूँ ||
मुझको क्यों ऐसा लगता है ,एक दिन तुम आओगे |
तुम अपने ही हाथों से , मुझको मुधुशाला पिलाओ तुम ||
मेरे इस तारीफ में , इक इशारा बनकर आओ तुम |
जगमगाते उन रौशनी में ,परी बनकर आओ तुम ||
तुम्हारे ही स्मिरती से ,खुद को कवि समझता हूँ |
मैं अपने ही जज्बातों से , तुमको सावरिया समझता हूँ ||
आओ लेकर चलता हूँ ,तुमको |
उन समंदर के किनारों पर ||
सनसनाहट सी हवाओं में शीतलहर कर देती है
तुमको जब भी देखता हूँ ,नए किरण का द्वार खुलता |
उन अंधेरी रातों में भी खुद को संभाले रहता हूँ ||
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