
ये मुश्किल बड़ी घड़ी है , संयम बनाए रखना |
ये वक्त कह रहा है ,
जान है तो जहान है ||
एक फासला बनाकर , खुद को बचाए रखना
घर से न निकलना , अपना मुकाम न बदलना ||
कैफियत पूछ ले उसकी , जो इस हालात से गुजर रहा है |
मसला ऐसा मानो , कि भूमि बंजर हो रही है ||
चुपचाप खड़ी हैं सड़कें , गुमसुम है चिड़ियों कि
चहचाहट |
ये जिंदगी बड़ी ख़ूबसूरत है , इसको बचाए रखना ||
ये मुश्किल बड़ी घड़ी है , संयम बनाये रखना ...
है नमन उन वीरों को
, जो दिन-रात सेवा में जुटें हैं |
सब कुछ छोड़ कर , सकंल्प से खड़ें हैं ||
नैन निर्मल हो गये हैं , देखकर ये नजारा |
ये वक्त ख़ूबसूरत है , अजमत करले उनकी |
ये मुश्किल बड़ी घड़ी है , संयम बनाये रखना ...
फिर लौटेंगी खुशियाँ ,
उन फूलों के आँगन में |
उत्साह भरा माहौल होगा , लहरायेंगी फसलें ||
उस रोशनी को देखकर , झूमेगा जग सारा |
ये मुश्किल बड़ी घड़ी है , संयम बनाये रखना ...
ALL RIGHTS RESERVED
S6 WRITERS COMMUNITY AND SHIVAM SANDOO
सुबह की किरण
वो शांत सा सा सागर है ,
शीश अपनी फैलाए हुए |
पंछियों
की आवाजों से,
नींद
से जगाते हुए ||
वह
मनमोहक सी हवा अपने पास बुलाते हुए |
कितनी
मनोहर है सुबह की किरण ||
वह गुमसुम सी हवाएं ,
वह गुमसुम से रास्ते |
वह
मखमल से बादल,
वह
कोमल सी सुगंधित हवाएं ||
हृदय को झंकारते हुए ,
सुरीली आवाजों में बुलाते हुए |
कितनी मनोहर है सुबह की किरण ||
वो
नम सी भूमि है ,
बेशुमार
मिट्टी की सुगंध |
दिल
के दो तार को ,
शीत लहर देते हुए ||
चिड़ियों की चहचहाहट ,
मानो संगीत बज रही हो ||
मन
को आकर्षित करते हुए ,
आवाज दे रही है |
कितनी
मनोहर है सुबह की किरण ||
नदियों के किनारों पर ,
उजली किरण छाई हुई |
धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए नरम दिल से बुलाते हुए ,
आवाज
दे रही है ||
कितनी
मनोहर है सुबह की किरण
दूर नभ में है छाई ,
उत्साह की बेशुमार दौलत |
केसरी
सी चमक ,
दिख रही है गगन में ||
उत्साह
का माहौल है ,
पंछी गीत गा रहे ||
धीमे धीमे हंसते-हंसते ,
आवाज दे रही है|
कितनी
मनोहर है सुबह की किरण ||
ALL RIGHTS RESERVED
S6 WRITERS COMMUNITY AND SHIVAM SANDOO
ये कैसी नादानी है............
ALL RIGHTS RESERVED
S6 writers community and shivam sandoo
शीतलहर
वो नम सी ठंड कहा ,महसूस तुम करपाओगे |
जब झरनों के किनारों पर अपने दिल का
हाल बताओगे ||
रूह के हर बंधन को, आजाद तब करपाओगे |
जब तरुन्नुम सी बारिश को ,सीने से लगाओगे ||
तुम बिखरे होए दाने को समेट रहे हो |
रिमझिम सी बारिश में घुल जाओगे ||
गुनगुनी सी धुप में रूबरू हो जाओगे |जब तुम महसूस करोगे मेरा शीतलहर ||
तुम थके हुए से लगते हो , आओ थोरा विश्राम कर लो |
पल दो पल की स्मिरती से ,शीतलहर ले जाओ तुम ||
मेरी इन साँझ में , चार चाँद लगाओ तुम |
मधुर चांदनी रातों में , एक मुसाफिर बनकर आओ तुम ||
मैं दूर नही हूँ , फिर भी लोग अनजान समझते है |
अपने मधुर एहसासो को मुझसे क्यों छुपाते है ||
मैं दूर नभ से आया हूँ ,एक प्यारी सी मुस्कान लेकर |
तुम अपने ही जज्बातों को ,मुझसे क्यों चुराते हो ||
देखो वो कोकिला तैयार है ,तुमसे दो टुक की बात करने |
उन सावन की आरुषि में , फिर से जरा आओ तुम ||
जब तुम चुप रहते हो ,ये पत्थर आवाज देने लगते है |
वो अपने ही मधुर एहसासो से ,मुझको खीचने लगते है ||
उठता हूँ गिरता हूँ ,लहरों के संग
चलने की कोशिश करता हूँ |
दूर उस गगन में ,शीतलहर का सन्देश देता हूँ ||
मुझको क्यों ऐसा लगता है ,एक दिन तुम आओगे |
तुम अपने ही हाथों से , मुझको मुधुशाला पिलाओ तुम ||
मेरे इस तारीफ में , इक इशारा बनकर आओ तुम |
जगमगाते उन रौशनी में ,परी बनकर आओ तुम ||
तुम्हारे ही स्मिरती से ,खुद को कवि समझता हूँ |
मैं अपने ही जज्बातों से , तुमको सावरिया समझता हूँ ||
आओ लेकर चलता हूँ ,तुमको |
उन समंदर के किनारों पर ||
सनसनाहट सी हवाओं में शीतलहर कर देती है
तुमको जब भी देखता हूँ ,नए किरण का द्वार खुलता |
उन अंधेरी रातों में भी खुद को संभाले रहता हूँ ||
*******************