Sunday, 2 May 2021

Ye Mushkil Badi Ghadi (ये मुश्किल बड़ी घड़ी ) By shivam sandoo




 

ये मुश्किल बड़ी घड़ी है , संयम बनाए रखना |

ये वक्त कह रहा है , जान है तो जहान है ||

एक फासला बनाकर , खुद को बचाए रखना 

घर से न निकलना , अपना मुकाम न बदलना ||

 

 कैफियत पूछ ले उसकी , जो इस हालात से गुजर रहा है |

 मसला ऐसा मानो , कि भूमि बंजर हो रही है ||

 चुपचाप खड़ी हैं सड़कें , गुमसुम है चिड़ियों कि चहचाहट |

 ये जिंदगी बड़ी ख़ूबसूरत है , इसको बचाए रखना ||

  ये मुश्किल बड़ी घड़ी है , संयम बनाये रखना ...

 

  है नमन उन वीरों को , जो दिन-रात सेवा में जुटें हैं |

  सब कुछ छोड़ कर  , सकंल्प से खड़ें हैं ||

  नैन निर्मल हो गये हैं , देखकर ये नजारा |

  ये वक्त ख़ूबसूरत है , अजमत करले उनकी |

 ये मुश्किल बड़ी घड़ी है , संयम बनाये रखना ...

 

  फिर लौटेंगी खुशियाँ , उन फूलों के आँगन में |

  उत्साह भरा माहौल होगा , लहरायेंगी फसलें ||

  उस रोशनी को देखकर , झूमेगा जग सारा |

 ये मुश्किल बड़ी घड़ी है , संयम बनाये रखना ...




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Wednesday, 21 April 2021

Subah ki kiran (सुबह की किरण ) By shivam sandoo




सुबह की किरण 


वो शांत सा सा सागर है ,

शीश अपनी फैलाए हुए |

पंछियों की आवाजों से,

नींद से जगाते हुए ||

वह मनमोहक सी हवा अपने पास बुलाते हुए |

कितनी मनोहर है सुबह की किरण ||

 

वह गुमसुम सी हवाएं ,

वह गुमसुम से रास्ते |

वह मखमल से बादल,

वह कोमल सी सुगंधित हवाएं ||

हृदय को झंकारते हुए ,

सुरीली आवाजों में बुलाते हुए |

कितनी मनोहर है सुबह की किरण ||

 

वो नम सी भूमि है ,

बेशुमार मिट्टी की सुगंध |

दिल के दो तार को ,

शीत लहर देते हुए ||

चिड़ियों की चहचहाहट ,

मानो संगीत बज रही हो ||

मन को आकर्षित करते हुए ,

आवाज दे रही है |

कितनी मनोहर है सुबह की किरण ||

 

नदियों के किनारों पर ,

उजली किरण छाई हुई |

धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए नरम दिल से बुलाते हुए ,

आवाज दे रही है ||

कितनी मनोहर है सुबह की किरण

 

दूर नभ में है छाई ,

उत्साह की बेशुमार दौलत |

केसरी सी चमक ,

दिख रही है गगन में ||

उत्साह का माहौल है ,

पंछी गीत गा रहे ||

धीमे धीमे हंसते-हंसते ,

आवाज दे रही है|

कितनी मनोहर है सुबह की किरण ||

       


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Monday, 19 April 2021

Ye kaisee nadanee hai (ये कैसी नादानी है ) By shivam sandoo

 


                        


      वह कहती है मै बारिश के बूंद हूं ,
       और वो उसमे भीगनी वाली परी....
       वह कहती है दुनिया को तो खुशी चाइए
       लेकिन मुझे हर खुशी में तुम।
       ये कैसी नादानी है
       कोई समझाता क्यों नहीं
 
        वह समंदर के किनारों पर इंतज़ार करती है|
       पर सामने आने पर आंखो से ओझल हो जाती है||
        वह फूलों के बागीचे  में मग्गन सी हो जाती है|
        पर पास आते ही उसके चहेरे की मुस्कान चली जाती है||
        ये कैसी नादानी है
        कोई उसे  समझाता क्यों नहीं
 
        वह संसार को देखती है|
        तो खाबो के समंदर में खो जाती है||
       खेतों के फसलों को देखकर ,उसका दामन खुशियों से 
    भर जाता है।
        कहीं बंजर भूमि देखी दिखी तो उसका मन उदास
    हो जाता है।
         मन तो यही करता है कि छूलूं |
        लेकिन पास आते ही आंखो  से ओझल हो जाती है||
        ये कैसी नादानी है
         कोई उसे समझाता क्यों नहीं
 
         सावन का महीना आते ही,
         चारो तरफ हवाओं में मृदंग बजते लगता है|
          वह सावन के झूलों के संग मस्त हो जाती है|
          लेकिन बात करने पर उसका जवाब नहीं देती है||
          ये कैसी नादानी है
          कोई उसे समझाता क्यों नहीं
 
          वह मेरे देश के लोगो को देखकर प्रसन्न हो जाती है|
          युवाओं के उज्जवल भविष्य की कामना करती है||
           कुछ ही क्षणों में निराश हो जाती है|
           वह कहती है तेरा देश मेरा देश है||
           फिर क्यों इतनी मायूसी छाई है?
           ये कैसी नादानी है
            उसे समझाता क्यों नहीं
 
          वह बादलों पंछियों और झरनों के संग बाते करती है|
         गेहूं के खेतों में मस्त सी हो जाती है||
         हवाओं के संग सांस में सांस मिलाकर लहराती है|
          कोयल के सुरो पर मधुर गीत गाती है,
          पास आते ही आंखो से ओझल हो जाती है||
          ये कैसी नादानी है
          कोई उसे समझाता क्यों नहीं
 
          वह अपने देश की माटी को अपने सलाखों पर रखती है|
           कहीं भी जाती अपने जज्बातों पर खरी उतरती ||
           उसके जैसा कोई नहीं फिर भी इतनी उदास क्यों रहती है|
           ये कैसी नादानी है
           कोई उसे समझाता क्यों नहीं
 
           वह प्रतिदिन नए उगते हुए सूरज को देखती है|
           वह उस रौशनी को देखती है जिसमें जीवन है||
           अंत में एक प्रश्न पूछ लेती है,
            एतना बखान क्यों करते हो मेरे इस प्रेम कहानी को?
           आखिर क्या रिश्ता है तेरा - मेरा?
            ये कैसी नादानी है
            कोई उसे समझाता क्यों नहीं
 
            ना जाने क्या रिश्ता है क्या नाता ,
            पर तेरी सुन्दरता को मुझे बाया करना आता है |
             दिल में क्या झरना मीठे पानी का सोता है ||

            ये कैसी नादानी है............

 

 

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Tuesday, 23 March 2021

शीतलहर (sheetlahar)by Shivam sandoo

 

                                                                     शीतलहर






वो नम सी ठंड कहा ,महसूस तुम करपाओगे |

 जब झरनों के किनारों पर अपने दिल का हाल बताओगे ||

रूह के हर बंधन को, आजाद तब करपाओगे |

जब तरुन्नुम सी बारिश को ,सीने से लगाओगे ||

 

तुम बिखरे होए दाने को समेट रहे हो |

रिमझिम सी बारिश में घुल जाओगे ||

गुनगुनी सी धुप में रूबरू हो जाओगे |

जब तुम महसूस करोगे मेरा शीतलहर ||

 

तुम थके हुए से लगते हो , आओ थोरा विश्राम कर लो |

पल दो पल की स्मिरती से ,शीतलहर ले जाओ तुम ||

मेरी इन साँझ में , चार चाँद लगाओ तुम |

मधुर चांदनी रातों में , एक मुसाफिर बनकर आओ तुम ||

 

मैं दूर नही हूँ , फिर भी लोग अनजान समझते है |

अपने मधुर एहसासो को मुझसे क्यों छुपाते है ||

मैं दूर नभ से आया हूँ ,एक प्यारी सी मुस्कान लेकर |

तुम अपने ही जज्बातों को ,मुझसे क्यों चुराते हो ||

 

देखो वो कोकिला तैयार है ,तुमसे दो टुक की बात करने |

उन सावन की आरुषि में , फिर से जरा आओ तुम ||

जब तुम चुप रहते हो ,ये पत्थर आवाज देने लगते है |

वो अपने ही मधुर एहसासो से ,मुझको खीचने लगते है ||

 

उठता हूँ गिरता हूँ ,लहरों के संग  चलने की कोशिश करता हूँ |

दूर उस गगन में ,शीतलहर का सन्देश देता हूँ ||

मुझको क्यों ऐसा लगता है ,एक दिन तुम आओगे |

तुम अपने ही हाथों से , मुझको मुधुशाला पिलाओ तुम ||

 

मेरे इस तारीफ में , इक इशारा बनकर आओ तुम |

जगमगाते उन रौशनी में ,परी बनकर आओ तुम ||

तुम्हारे ही स्मिरती से ,खुद को कवि समझता हूँ |

मैं अपने ही जज्बातों से , तुमको सावरिया समझता हूँ ||

 

आओ लेकर चलता हूँ ,तुमको |

उन समंदर के किनारों पर ||

सनसनाहट सी हवाओं में शीतलहर कर देती है

तुमको जब भी देखता हूँ ,नए किरण का द्वार खुलता |

उन अंधेरी रातों में भी खुद को संभाले रहता हूँ ||

                                        - शिवम् सन्दू ( Published Author )

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Humsafar : Ek Ajab Daastan By the rising estaar